इस ब्लॉग पर पोस्ट की गयी तस्वीरों (Photographs) पर क्लिक कर के आप उन्हें और स्पष्ट देख सकते हैं।

Saturday, 31 December 2011

आप सभी को नव वर्ष 2012 सपरिवार मंगलमय हो!

Thursday, 29 December 2011

समानता

ऋग्वेद के अंतिम सूक्त में कहा गया है-

समानी व् आकूतिः समाना  ह्र्दयानी वः।
समानमस्तु वो मनो यथा  वः सुसहासति॥
 
अर्थात  हे मनुष्यों!तुम्हारा ध्येय सामान हो,तुम्हारा ह्रदय समान हो,तुम्हारा मन समान हो जिससे तुम सब का व्यवहार सामान हो सके।
इस मन्त्र में तीन बातें कही गयीं हैं-
(१)ध्येय की समानता (२) ह्रदय की समानता और (३) मन की समानता होने पर ही हम सब अर्थात  विद्यमान जगत के समस्त प्राणी सुख से जीने की आशा कर सकते हैं क्योंकि जब इन तीनों में परस्पर समन्वय होगा तो हमें कोई कष्ट हो ही नहीं सकता.आइये जरा और गहराई से विचार करें- 

(१)ध्येय की समानता-अर्थात प्रत्येक मनुष्य का एक निशित ध्येय होना चाहिए.बिना ध्येय के हम अपने कर्म ठीक प्रकार से नहीं कर सकते.ध्येय के निर्धारित कर लेने के पश्चात ही हमें ध्येय को प्राप्त करने के साधन सुलभ हो सकेंगे और उन साधनों के सहयोग से कर्म करते हुए हम सन्मार्ग पर चल कर ही अपना ध्येय प्राप्त कर सकते हैं.ऐसा नहीं है कि ध्येय की प्राप्ती सुगमता पूर्वक ही हो जाये अपितु ध्येय प्राप्ति के मार्ग में अनेकों बाधाएं भी आती हैं और उन बाधाओं का यदि हमने दृढ़ता पूर्वक सामना कर लिया तो फिर ध्येय को प्राप्त करने से हमें कोई नहीं रोक सकता.एक उदाहरण के तौर पर हम कह सकते हैं कि शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन का लक्ष्य (ध्येय)नयी दिल्ली से भोपाल तक जाना है रास्ते में कहीं कहीं बिना निर्धारित स्टेशन अथवा सुनसान इलाकों में तकनीकी कारणों से भी इसे रूकना पड़ता है फिर भी यह ट्रेन आखिरकार विलम्ब से ही सही अपने ध्येय (अथार्त भोपाल)तक पहुचती ही है.इसके विपरीत दिल्ली से चलते समय यदि निर्धारित न किया जाता कि कहाँ जाना है तो पाठक जन समझ सकते हैं कि क्या स्थिति होती.ध्येय की समानता का तात्पर्य इस श्लोक में यह है कि बाल्यावस्था में सभी का ध्येय विद्या अर्जन करना हो,युवावस्था में गृहस्थी चलाना व् धन संग्रह करना हो,तथा वृद्धावस्था में मोक्ष प्राप्ति हेतु ईश्वर की आराधना करना व् बालकों व् युवाओं का अपने ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर शैक्षिक मार्गदर्शन करना होना चाहिए. वृद्धावस्था में ईश्वर से हमें यह भी प्रार्थना करनी चाहिए कि जीवन की बीत चुकी अवस्थाओं में यदि हम से अनजाने में कोई अपराध तो ईश्वर उस हेतु हमें क्षमा करे-

यदि दिवा यदि रक्त्मेनांसी चक्र्मा वयम।
वायुर्मा तस्मादेनसो विश्वन्मुंचतवं हसः॥
 
(२)ह्रदय की समानता -ह्रदय की समानता से आशय ह्रदयगत भावों की समानता से है.हम सबके ह्रदय शुद्ध,पवित्र और निर्मल हों.प्राणिमात्र के प्रति भी कोई दुर्भावना न रहे जिससे हम सद्कर्म करने को प्रेरित हों.यदि ह्रदय में विद्वेष की अग्नि धधकती रहेगी तो हम अपने जीवन के मुख्य लक्ष्य से विमुख हो जायेंगे और परमपिता द्वारा मृत्यु के पश्चात् दिए जाने वाले मोक्ष से वंचित हो सकते हैं.इसलिए समस्त मानवों की ह्रदयगत कामनाओं का पवित्र होना आवश्यक है।

(३)मन की समानता-अर्थात प्रत्येक मनुष्य का मन शुद्ध विचारों से युक्त होना चाहिए तभी हम ईश्वर प्राप्ति की अभिलाषा रख सकते हैं.यदि आधुनिक दृष्टिकोण से सोचें तो मन world wide web (www) के सामान है.हम जानते हैं की world wide web इन्टरनेट पर उपलब्ध विभिन्न प्रकार की साइट्स का एक जटिल समूह है,जिसमे एक ही विषय पर अनेकों साइट्स हैं और दुनिया के किसी भी स्थान से हम कंपयूटर द्वारा इच्छित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.इन साइट्स के समूह में कुछ अच्छी साइट्स है तो कुछ बुरी साइट्स भी हैं.ठीक इसी प्रकार हमारे मन में कुछ अच्छे विचार हैं तो कुछ बुरे विचार भी हैं और यह हमारे ऊपर निर्भर करता है की हम कौन से विचारों से प्रेरित हो कर अपना कार्य करते हैं.यदि हम अच्छे विचारों की अधिकता के कारन अच्छा कार्य करते हैं तो अच्छे कार्य का अच्छा परिणाम भी प्राप्त करते हैं.यजुर्वेद के अध्याय ३४ में हम ईश्वर से अपने मन को शिव अथार्त संकल्पों (विचारों)से युक्त बनाने की प्रार्थना करते हैं-

यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरंगमम ज्योतिषाम ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥
 
इस प्रकार यदि हमारा मन अच्छे संकल्पों (विचारों) से युक्त रहेगा तो निश्चय ही हम सब सुखपूर्वक रह सकेंगे।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं की ध्येय,मन और ह्रदय के अंतर्संबंधित होने के कारन इन तीनों की समानता अथार्त इन तीनों में समन्वय का होना आवश्यक है.वेद हमें धर्म के नाम पर बांटते नहीं बल्कि समभाव का सन्देश देते हैं.वेदों ने प्रत्येक मनुष्य का गुण ,कर्म और स्वभाव के आधार पर वर्गीकरण किया है जो वर्ण व्यस्था कहा जाता है.वेदों में समानता का आशय प्रत्येक प्राणी में ध्येय, मन और ह्रदय की समानता है जातियों की मतैक्यता से नहीं.सवाल यह उठता है कि आज के गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में जबकि प्रायः सभी का उद्देश्य साम,दाम,दंड,भेद की नीति से अर्थप्राप्ति जी रह गया है क्या हम ध्येय,मन और ह्रदय की समानता की उम्मीद कर सकते हैं? निश्चित ही इसके लिए हमें नदी की धारा के विपरीत चलने का प्रयास करना होगा.आवश्यकता है केवल मजबूत इच्छाशक्ति और सकारात्मक मानसिक अभिप्रेरणा की.

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुखभाग भवेत् ॥



टिप्णी--प्रस्तुत आलेख अक्टूबर २००४(यह लेखक तब बी.कौम अंतिम वर्ष का छात्र था) में आगरा से प्रकाशित एक त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है.



Ref --http://jomeramankahe.blogspot.com/2010/09/blog-post_2827.html


My favt song....

 Writer: OVERSTREET, PAUL/SCHLITZ, DON 
Singer: Keith Whietley 

It's amazing how you can speak right to my heart
Without saying a word, you can light up the dark
Try as I may, I could never explain
What I hear when you don't say a thing

[Chorus]
The smile on your face lets me know that you need me
There's a truth in your eyes sayin' you'll never leave me
The touch of your hand says you'll catch me if ever I fall
You say it best when you say nothing at all

All day long I can hear people talking out loud
But when you hold me near, you drown out the crowd
Old Mr. Webster could never define
What's being said between your heart and mine

The smile on your face lets me know that you need me
There's a truth in your eyes sayin' you'll never leave me
The touch of your hand says you'll catch me if ever I fall
You say it best when you say nothing at all.....2
 --------------------------------------------

--------------------------------------------
Am very much crazy and a great fan of this song.its a ring tone of my mobile since a long time .
सोच रहा हूँ
आने वाले साल
मैं मैं न रहूँ
कुछ और हो जाऊँ
अपने ही भीतर
एक ठौर पा जाऊं
और मुक्त हो जाऊं
खुद को खुद पर
लादे रहने के
भार से !

Sunday, 25 December 2011

दीवार पर लगी तस्वीर  में एक चेहरा खाली है
उसे इंतज़ार है बेसब्री से मेरे चेहरे का
और मुझे भी इंतज़ार है दीवार पर टंगने का
किसी की नज़र तो अपना समझ कर देखेगी मुझ को
और फिर कह देगी नज़रों से नज़रों की बातों को
ये बात और है कि सुनने के लिए मैं न होउंगा ज़मीन पर
हिलती तस्वीर ही कह देगी मेरी बात हवा के झोंकों पर
महसूस करना न करना उसकी मर्ज़ी है
बेज़बानों को इतना तो दर्द होता ही है

----यशवन्त माथुर



HAPPY CHRISTMAS TO ALL

Saturday, 24 December 2011

ऐसा भी होता है----

आज अगर अनुपमा जी मेरी कविता सपने का लिंक आज हलचल पर नहीं लगातीं तो मुझे नहीं पता चलता कि एक जनाब ने प्रोफाइल मे मेरी कविता को कॉपी कर रखा है।
यह है इनकी प्रोफाइल ---
http://www.blogger.com/profile/03922523430246846927
 
इनको मैंने मेल किया है जो इस प्रकार है---


"यशवन्त माथुर 
12:22 PM (3 hours ago)

to utkarsh
उत्कर्ष जी
आपकी प्रोफाइल को देखने का अवसर प्राप्त हुआ और मैंने पाया कि अपनी प्रोफाइल के Interests मे  Find the best way of living लिखने के बाद आपने बिना अनुमति / बिना मेरे नाम के  मेरी ही कविता को हू ब हू प्रकाशित कर रखा है।
यह स्पष्ट रूप से कॉपी राइट का उल्लंघन है।
आप से निवेदन है कि कृपया वस्तुस्थिति को शीघ्र स्पष्ट करें एवं इन पंक्तियों को प्रोफाइल से हटा लें।"

मेरी कविता का लिंक यह रहा---http://jomeramankahe.blogspot.com/2011/04/blog-post_12.html 


इस समय शाम का 3:30 बजा है अभी तक साहब का कोई जवाब नहीं आया है।


8:20 PM 
-----
यह जवाब मेल पर प्राप्त हुआ है---

yashwant ji aap ne jaisa kaha ki maine aap ki kavita ko apni profile se hata diya hai aur aap ko yakin dilane ki kosis karta hu ki aage se aisa nahi karunga, waise aapne likha hi itna accha tha jo ki meri feeling ko same to same match karta tha so maine aisa kaiy aagar aap nahi chahte hai to aisa aage se nahi karunga, but aapka blog read to kar sakta hu na mai aur usko like ya comment karne me aapko koi aapati(problem) to nahi hai please forget this.

और इस जवाब का मैंने यह रिप्लाई किया है--

आपके उत्तर के लिए धन्यवाद उत्कर्ष जी।
यदि आप साथ मे मेरा नाम भी दे देते तो मुझे आपति नहीं होती।
आप मेरा ब्लॉग पढ़ सकते हैं...कमेन्ट भी दे सकते हैं।
शुभकामनाएँ !

Friday, 23 December 2011

कोई संकल्प नहीं......

नया साल आने वाला है...बस कुछ दिन की कसर रह गयी है। तमाम लोग आत्मावलोकन करेंगे....2011 मे क्या खोया क्या पाया ...कुछ ईमानदारी से खुद को तोलेंगे और कुछ कहेंगे नहीं मुझे कुछ नहीं मिला मैंने तो सिर्फ खोया है...या कुछ कहेंगे ये मिला वो मिला। सच तो यह है कि हर दिन हम कुछ खोते  हैं...कुछ पाते हैं।अपने खोने पाने की एनुअल बैलेंस शीट बनाना न जाने क्यों मुझे बहुत अटपटा सा लगता है क्योंकि Liabilities और Assets जब बराबर हों तो ही वो बेलेन्स शीट है नहीं तो फिर छानो सारे एकाउंट्स। बड़ा झमेले वाला काम है इसीलिए कॉमर्स का स्टूडेंट होने के बावजूद मुझे किस्मत ने एकाउंटेंट न बना कर पहले सेल्स मैन बनाया लोगों से खासकर महिलाओं से बात करने का तरीका सिखाया  फिर कस्टमर केयर की कुर्सी पर बैठाया और जब ये लगा कि यह काम सीख लिया है तब ब्लॉगर और फिर कंप्यूटर हार्डवेयर का काम भी सीखा दिया। अब भी एक जरूरी चीज़ सीख रहा हूँ ....वो भी कुछ दिन मे सब के सामने आ जाएगी। उसके बाद क्या सीखूँगा पता नहीं। पर इतना तय है कुछ न कुछ मिल ही जाएगा सीखने को।
खैर एक लाइन मे कहूँ तो मैं इस तरह का कोई रिव्यू नहीं करता कि क्या खोया क्या पाया न कोई संकल्प करता हूँ कि नए साल मे ऐसा करूंगा या ऐसा नहीं करूंगा।
अरे भई मेरा भी तो अपना व्यू है न ...है कि नहीं :)

Wednesday, 21 December 2011

इस तरह गायब न हुआ करो .........

यूं ही मन मे उठे कुछ रूमानी ख्याल----

इस तरह गायब न हुआ करो अचानक कि
सरे राह तुम को खोजता फिरूँ
और फिर तुम ये कहो कि
अजीब पागल हूँ मैं 

माना कि आदत नहीं डालनी
तुम्हारे साये की
न जाने क्यों इस साये को
अपना समझ बैठा हूँ मैं

न आया करो इस बंजर में
कोई गुलज़ार बन के
तुझे हमराह पाकर
बिखर उठता हूँ मैं

तेरा यूं आना और
यूं जाना अचानक
तू न समझना कभी
कितना तड़प उठता हूँ मैं
--------
To.
'My dear'
From and written by-----यशवन्त माथुर 

Tuesday, 20 December 2011

एक वास्तविक सत्य कथा

बच्चों से लगना...उनको छेड़ना .....उनसे मज़ाक करना...और उनके सामने उनकी नकल बनाना ....कोई बहुत ही छोटा बच्चा है यानि अगर गोदी का है तो उससे अपने बाल खिंचवाना.....और खुद को पिटवाना मुझे बहुत पसंद है।

ऐसे ही एक बार एक छोटे बच्चे को छेड़ दिया ...मैंने उसके पालतू कुत्ते को कुत्ता कह दिया और उस नन्हें दोस्त का पारा हाई .....अंकल आपने इसे कुत्ता क्यों कहा ....मैं बोला... तो और क्या कहूँ ?......नहीं ये कुत्ता नहीं है ....मैंने कहा देखने से तो कुत्ता ही लगता है पर हो सकता है छोटी गाय हो......अब तो वो और नाराज़ ..... उसे अपने सीने से लगाते हुए पुचकारते हुए बोला....ये तो मेरा डोगी है...प्यारा सा डोगी.....उसके इतना कहते ही वो छोटा सा डोगी जो कुत्ता कह देने से मुझ पर आँखें तरेर रहा था ....एक दम से दुम  हिलाने लगा.....जैसे मुझ से  कह रहा हो  यू ब्लड़ी चश्मुद्दीन ! कुत्ते को कुत्ता कहोगे तो यही होगा। 



अंतर अभी और बढ़ेगा .......

(as on 20/12/2011 11:00 AM)


(फोटो पर क्लिक करने से फोटो साफ और बड़ा दिखाई देगा। )

अंतर बढ्ने से आशय सिर्फ इतना है कि मेरी दिली तमन्ना है कि नयी-पुरानी हलचल आगे बढ़ती रहे क्योंकि यह सिर्फ अकेले मेरा नहीं सबका ब्लॉग है। हर उस व्यक्ति का ब्लॉग है जो ब्लॉग लिखता है।  संगीता आंटी,सुनीता जी ,अनुपमा जी और सदा जी का साथ बहुत अनमोल है और इन्हीं  की वजह से आज हलचल बहुत तेज़ी से लोकप्रिय होने वाला ब्लॉग बनता जा रहा है।

Friday, 16 December 2011

पत्थर !

बन जाना चाहता हूँ एक पत्थर
जिस पर कोई असर नहीं होता
न खुशी का ,न गम का
जिसमे नहीं होती भावनाएँ
बस कुछ  आड़ी तिरछी लकीरों को
अपने साथ लिये
छैनी हथोड़े की चोटें खा खा कर
लहरों से टकरा टकरा कर
टुकड़े टुकड़े होता है
दीवारों मे चुनता है
पर अस्तित्व
कभी नहीं खोता है
पत्थर !

Wednesday, 14 December 2011

 एक खाली पन सा  है और इस खाली पन मे कमी है तो बस कुछ उपदेशकों की जो बस सिदान्तों और नीतियों की बात बताना शुरू करेंगे तो बस तब तक शुरू ही रहेंगे जब तक कानों पर हाथ रख कर विनम्रता से माफी न मांग ली जाए। लेकिन डर है अगर इस माफी को दिल पर ले लिया तो क्या होगा.....बवंडर के आने मे ज़्यादा देर नहीं।
कभी नहीं सोचा था कि इस मोड़ पर आकर तुम यूं अचानक मिलोगे और इससे पहले कि यह अनदेखा ख्वाब वास्तविकता की ज़मीन पर उतरे तुम्हारा अचानक कहीं गुम हो जाना नाकाबिले बर्दाश्त हो रहा रहा है।

(काल्पनिक )

उद्देश्य

उद्देश्य ...ये उद्देश्य भी बहुत अजीब चीज़ होती है सच मे। हर चीज़ का उद्देश्य ....हर बात का उद्देश्य होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उद्देश्यों का जाल हमे उलझाए  रखता है। और हम फंसे रहते हैं.....कितनी भी कोशिश कर लें जितना उद्देश्यों से बचने की कोशिश करेंगे ....उद्देश्य हमे और घेरेंगे लिहाजा स्वभावतः यथास्थिति हर समय कायम रहती है।

जब मैं ब्लोगिंग मे आया था क्या उद्देश्य था पता नहीं । लेकिन यह 'पता नहीं' भी एक उद्देश्य ही तो था और इस 'पता नहीं' ने आज मुझे एक उद्देश्य दे दिया है ....एक मिशन दे दिया है जिस पर मुझे काम करना है और मैं कर रहा हूँ। वो बात अलग है कि मैं स्लो मूवर हूँ कितना भी तेज़ दौड़ लगाने की कोशिश कर लूँ।

कभी मैं बिलकुल नया था इस लाइन में अब  लगभग डेढ़ साल पुराना हो गया हूँ फिर भी सब कुछ पहले जैसा ही नया लगता है। अंतर भी आया...कभी मुझे तकनीक का बिलकुल ज्ञान नहीं था आज ब्लॉग और फेसबुक के अंदर घुसा हुआ हूँ ....किस ऑप्शन मे जा कर क्या करना है मुझे पता है.....कुछ लोग सलाह भी मांगते हैं और मैं आत्म संतुष्टि की कीमत पर अपनी सलाह दे भी देता हूँ....कभी कभी 'ओवर कोन्फ़िडेंस' मे  बिन मांगी भी।

देखा टोपिक से हट गया न मैं.....बात उद्देश्य की हो रही थी और पहुँच गया कहाँ से कहाँ । तो लाख टके का उद्देश्य दे दिया है 'नयी-पुरानी हलचल' ने कि चाहे जो हो अपने जैसे नए लोगों(ब्लोगर्स) को खोजना है और उन्हें हाइप देना है .....मुझे अच्छा लगता है जब फेसबुक और हलचल पर मेरे पसंद के लिंक्स पर कमेंट्स पहुँचते हैं ....आखिर उनके ब्लोगस को लोग जानते तो हैं ....ये तो रहता है कि हाँ फलां भी ब्लॉग लिखता/ लिखती हैं। मेरा क्या जाता है।

मैं जानता हूँ स्वार्थी लोग इस उद्देश्य मे मेरा स्वार्थ ढूढ़ेंगे तो मैं खुद को स्वार्थी स्वीकार करते हुए कहना चाहता हूँ कि मेरा वही स्वार्थ है जो मेरा उद्देश्य है।
सर्च ऑपरेशन जारी है :)

Tuesday, 13 December 2011

तेज़ी से दौड़ रहा है मन
पाने को मंज़िल
मगर
वक़्त की चाल के आगे
हर रफ्तार कम लगती है।

-----यशवन्त माथुर

Saturday, 10 December 2011

अफसोस कि ढ़ोल को उसकी पोल खुलने का एहसास नहीं हो रहा और वो इसी गुमान मे है जैसे किसी को कुछ पता ही न हो।


होता है ...होता है ....ऐसा भी होता है :)

Wednesday, 7 December 2011

just an imagination ......

माना कि
कितने ही फर्जी नामों से
तुम मेरे आसपास हो
पर ये मत भूलना
देखा है मैंने
नकाब के पीछे छिपा
तुम्हारा असली चेहरा
हजारों बार।

Tuesday, 6 December 2011

Originally Shared on Facebook



कौन कहता है तनहाई में ,कोई शख्स रोता है ।
जब कोई न हो साथ ,हमसफर अक्स होता है।।

    -----यशवन्त माथुर









                                                                                                                           

Friday, 2 December 2011

आय एम शॉक्ड

"Thanks Yashwant ! for his eagerness to help!
God Bless !

Ashish "

यही वो पंक्तियाँ हैं  जो अक्षरशः मुझे याद हैं पर अफसोस कि इसकी स्कैन कॉपी मेरे पास नहीं है :( और याद क्यों न हों मेरे प्रोफेशनल कैरियर का सब से पहला कमेन्ट था यह; जो आंटी जी के यह कहने कि इसके लिए कुछ लिख दो आशीष जी ने बिग बाज़ार मेरठ पी वी एस स्टोर मे शायद  17 या 18 अगस्त 2008 को वहाँ की "शेयर विद अस"बुक मे लिखा था।मुझे याद है कि 15 अगस्त के ओफर्स बीत जाने के बाद आशीष जी एज़ ए कस्टमर आंटी जी के साथ अपना खरीदा कुछ सामान एक्सचेंज करने आए थे। चूंकि उस दिन मैं फ्लैट शिफ्ट (स्टोर ओपनिंग 10 बजे से क्लोजिंग रात 10 :30 बजे तक) मे कस्टमर सर्विस डेस्क पर काम कर रहा था इसलिये उस दिन करीब 350 एक्सचेंज मैंने क्लीयर किए थे। शायद आंटी जी को मेरा काम करने का तरीका पसंद आया था और उसके बाद जब भी आशीष जी स्टोर मे आते तो मुझ से मिलते ज़रूर थे। उसी महीने यानि 31 अगस्त को मुझे एम्प्लोयी ओफ द मंथ भी चुना गया मुझे लगता है यह आशीष जी और आंटी जी के  आशीर्वाद से ही संभव हुआ होगा क्योंकि इस अवार्ड के बारे मे कि मुझे मिलेगा मैं सोच भी नहीं सकता था।
बाद मे मैंने मेरठ से कानपुर ट्रांसफर ले लिया और आशीष जी से डिसकनेक्ट हो गया। उस समय मैंने नहीं सोचा था कि एक ब्लॉगर के रूप मे उन से फिर से संपर्क होगा।  लेकिन ऐसा हुआ और यह एक चौंकाने वाला अनुभव था क्योंकि मैंने ब्लॉग 2010 मे बनाया और तब तक मेरठ छोड़े 2 साल हो गए थे।इतने दिन तक जाने कितने ही मोल्स मे उनका जाना हुआ होगा और मेरे जैसे जाने कितने ही कस्टमर सर्विस एक्ज़ीक्यूटिव्स से मिले होंगे।   लेकिन यह आशीष जी का बड़प्पन ही कहूँगा उन्होने मुझे याद रखा और उनका याद रखना भी मेरे लिये एक उपलब्धि ही है।

किसी अपने का छोड़ कर जाना बहुत दुख देता है और कल जब आशीष जी के ब्लॉग पर आंटी जी के निधन  की दुखद सूचना पढ़ी मेरा मन किसी काम मे नहीं लगा यहाँ तक कि आज की हलचल भी बहुत बेमन से बना कर लगाई है।  मुझे नहीं मालूम मुझे आंटी से कैसा लगाव था लेकिन अगर पूर्वजन्म होता है तो यह कोई ऐसा ही संबंध होगा।

आगे और कुछ लिखते नहीं बन रहा है ;मैं बहुत शॉक्ड हूँ यह सब जान कर और मेरी ईश्वर से कामना है कि आशीष जी को यह असीम दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।

Thursday, 1 December 2011

यदि आँखों मे रोहे या किसी तरह की समस्या है तो Wheezal कंपनी की 'Eye Bright' होम्योपैथिक eye drops का प्रयोग लाभ दायक हो सकता है।
इसके लगातार प्रयोग से मेरे चश्मे के नंबर मे कुछ कमी आई है।

लाइनक्स

लाइनक्स (Linux )एक मुफ्त और सबसे सुरक्षित ऑपरेटिंग सिस्टम है। पहले हम जान लें कि ओपेरेटिंग सिस्टम होता क्या है? सामान्य भाषा मे हम कह सकते हैं कि ऑपरेटिंग सिस्टम ही कंप्यूटर पर कार्य करना संभव बनाता है। इसे कंप्यूटर की आत्मा भी कह सकते हैं।
ज्यादतर हम विंडोज़ पर काम करना पसंद करते हैं और यह भी सत्य है कि हममे से ज़्यादातर के कंप्यूटर पर हमारे जाने अनजाने पायरेटेड विंडोज़ इस्टाल होती है। जिसे अगर वास्तविक मूल्य दे कर खरीदा जाए तो उसकी कीमत एक नए कंप्यूटर की कीमत से लगभग दो गुनी  ज़्यादा हो सकती है।
इसके विपरीत लाइनक्स एक  पूर्णतः मुफ्त और आसान ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसके यूं तो बहुत से वर्जन उपलब्ध हैं किन्तु उन सब मे सबसे अधिक लोकप्रिय उबुंतु (ubuntu) है जिसका इंटरफेस काफी कुछ विंडोज़ जैसा ही है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लाइनक्स आधारित कम्प्यूटर्स मे एंटी वायरस सॉफ्टवेयर डालने की कोई ज़रूरत ही नहीं है । यह अपने आप मे बहुत सुरक्षित और ठोस ऑपरेटिंग सिस्टम है जिसकी जितनी जितनी भी कॉपियाँ बना कर आप किसी को दीजिये पायरेसी का इल्ज़ाम किसी सूरत मे नहीं लग सकता अर्थात यह ओपन सोर्स है। अगर आप कंप्यूटर प्रोग्रामिंग  की जानकारी रखते हैं तो लाइनक्स के स्वरूप मे मनचाहे परिवर्तन कर के भी अपना खुद का वर्जन सभी को उपलब्ध करा सकते हैं।

आप चाहें तो उबुंतु के बारे मे यहाँ जान सकते हैं---www.ubuntu.com

Sunday, 27 November 2011

Searching my self....
here and there..
walking around the world...
through the net;
through the google...
......can't find myself :(
where i am?
शब्द!
न जाने क्यों
इतना बिखरे बिखरे से लग रहे हैं
शायद इंतज़ार कर रहे हैं
मेरे भी बिखरने का
ये बिखरे बिखरे से
शब्द!
 
(कभी इसे फेसबुक स्टेटस मे लिखा था)

बात बन गयी



सोचना है कुछ
कुछ लिखना है
करनी है ईमेल
और जल्दी से भेजना है
संपादक को छापने की जल्दी है
और मुझे छपने की
अपना नाम देखने की
जल्दी है ,बहुत जल्दी है
सच मे क्या करूँ
लाइनें लिखता हूँ
मिटाता हूँ
बार बार दोहराता हूँ
और डालता  हूँ
आस पास एक नज़र
कोई विषय मिल जाए
तो बात बन जाए
दोनों की 
छपने वाले की भी
छापने वाले की भी
और बनती जा रही हैं
यह पंक्तियाँ
जो आप पढ़ रहे हैं
अपना सिर पकड़ के

भौहों को तान के
झेल रहे हैं
यह हल्की फुलकी नज़्म (?)
कविता (?)
या कुछ और
जो भी हो
मेरी तो बात बन गयी
पर  आपकी ?  :)

(www.nazariya.in पर पूर्व प्रकाशित )

चैट

बात करने का एक तरीका होता है चाहे वह बात फोन पर हो या चैट पर ,किसी बड़े से हो या छोटे से,या बराबर वाले से। बात शुरू हाय,हैलो या नमस्ते से होती है तो खत्म भी कम से कम बाय से ही होती है। खासतौर से ऑनलाइन चैट शुरू हो जाने के बाद अगर एक तरफ से किसी का जवाब नहीं आता तो दूसरे को उलझन होना स्वाभाविक है। इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि बात को सही तरह से समाप्त कर दिया जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है या होता भी है तो  कभी कभी और बहुत कम होता है। नतीजा चैट लिस्ट से बाहर हो जाने के रूप मे सामने आता है।

कुछ ऐसे ही दोस्तों की संगत मुझे भी प्राप्त हो गयी है जो बात करते करते अचानक गायब हो जाते हैं या बात को लटकाकर चले जाते हैं उसके बाद भी उनको अपेक्षा  रहती है कि उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए। कुछ लोगों को तो मैंने उनके आचरण की वजह से चैट लिस्ट से बाहर भी कर रखा है। हालांकि इससे कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि मैं खुद अब बहुत कम ही ऑनलाइन नज़र आता हूँ।  

Saturday, 26 November 2011

घने अंधेरे में
चलते चलते
अचानक
एक हल्की सी रोशनी
आ गयी मेरा साथ निभाने
और मेरी परछाई
कोशिश करने लगी
मुझ से बातें करने की
न चाह कर भी
मैं मुंह न मोड़ सका
उससे
सारे रास्ते
मुझे झेलना ही पड़ा
अपने ही अक्स को।

Friday, 25 November 2011

Out of date…

Like to listen old classics
Like to live in a simple way
Not a liquor
Smoker
haven't the qualities
of the modern day
My friends says-
am out of date
and proudly
i accept the words
yes….am out of date
coz…outdated things;
are more valuable
than the newer once
proud to be an old
and old is always gold :))))

Please do not ignore grammatical mistakes and help me to improve my English.
हैं नहीं कुछ भी पर खुद को खुदा समझते हैं वो,
मजबूर आदत पर वश उनका चलता नहीं है
कितनी बार समझाया कि बदल जाओ ए दोस्त
घड़े हैं इतने चिकने कि असर कुछ होता नहीं है।

Thursday, 24 November 2011

फेसबुकियों के हित में जारी---

फेसबुक पर आजकल एकाउंट  हैक होने का बड़ा हल्ला मचा हुआ है। अगर आप भी फेसबुक पर हैं तो एक छोटा सा काम कीजिये--
Account Settings में जाइये --वहाँ Security पर क्लिक कीजिये और  Secure browsing को Enable कर के सेव कर लीजिये।
अब एक चीज़ ध्यान से देखिएगा  आपके ब्राउज़र की विंडो मे  फेसबुक एड्रेस की शुरुआत में http:// की जगह https:// लिखा आ रहा होगा। इसका मतलब कि आपका एकाउंट अब काफी हद तक सुरक्षित है।
वैसे यह कोई स्थायी समाधान नहीं है फिर भी कुछ तो मदद मिलेगी ही ।
और हाँ प्लीज़ (खास तौर से महिलाएं) अपनी व्यक्तिगत तसवीरों पर प्राइवेसी लगा कर रखें यानि अपनी फोटोस को बहुत ही चुने हुए ,विश्वस्त और खास फेसबुक मित्रों के साथ ही साझा करें।


यह पोस्ट फेसबुकियों के हित में जारी!

Tuesday, 22 November 2011

अभिभूत हूँ ...........

यूं तो हमेशा से ही मेरा जन्मदिन सादगी से मनाया जाता रहा है और कल  भी उसी सादगी से मनाया गया और आने वाले वर्षों मे भी यह सादगी कायम रहेगी।हर साल की तरह पापा-मम्मी ने कल भी हवन किया और कुछ आहुतियाँ मैंने भी डालीं। वैसे भी हवन विशुद्ध भारतीय और वैदिक पद्धति का ज़रूरी हिस्सा है  जिससे न केवल आसपास का वायुमंडल स्वच्छ होता है बल्कि आत्मिक शांति भी मिलती है। खैर अगर इस विषय पर कुछ बोलूँ प्रवचन जैसा हो जाएगा और आप लोग पक जाओगे इसलिए यह बात बस इतनी ही।

हाँ तो मैं यह कह रहा था कि मुझे इस बात का एहसास तो था कि अच्छी ख़ासी शुभकामनाएँ मिलने वाली हैं ब्लॉग पर भी और फेसबुक पर भी और जिस तरह से 20 तारीख से ही एस एम एस -फोन और फेसबुक का सिलसिला एडवांस मे चला यह विश्वास पक्का था।

लेकिन मैं सपने में  भी नहीं सोच सकता था कि कोई मुझ पर कविता लिख देगा लेकिन यह सपना नहीं अब तो हकीकत है और आपके सामने है नीचे की तस्वीर देखिये--


और वो 'कोई' कोई और नहीं आदरणीय अरुण निगम जी हैं जिन्होने दो दिन पहले ही 22 तारीख को शब्दों की मिठाई खाने का ज़िक्र मेरी फेसबुक वॉल पर किया था लेकिन तब मैं उनका मतलब नहीं समझ पाया था।यह कविता उन्होने मुझे मेल पर भेजी है।  मैं किन शब्दों मे उनको धन्यवाद कहूँ समझ नहीं पा रहा हूँ लेकिन उनका यह स्नेह अभिभूत कर देने वाला है।

एक और सरप्राइज़ गूगल बाबा ने भी दे दिया पता नहीं जाने अनजाने या कुछ और बात हो। कोई चीज़ सर्च करने जब गूगल खोला तो यह नज़ारा था---


इसमें गूगल के टाइटिल पर नज़र डालिये। इसी साइट को जब पापा की आई डी से खोला तो 'गूगल' अपने स्टेंडर्ड रूप मे ही लिखा मिला।

बहुत लोगों के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि 'ऐसा तो होता रहता है'।  पर मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है।

हाँ एक दो लोगों ने मुझ से केक खाने को कहा मुझे केक पसंद भी है लेकिन पापा -मम्मी को नहीं पसंद वैसे भी इस मौके पर अकेले खाना मुझे अच्छा नहीं लगेगा तो प्लीज़ इस बार  के लिए सॉरी पर कभी मौका मिलेगा तो ज़रूर सबके साथ केक का भी स्वाद लिया जाएगा।

और हाँ देर से ही सही पर चलते चलते वर्चुअल मिठाई का स्वाद आप भी ले लीजिये---


 एक बार पुनः आप सभी की शुभकमानाओं-आशीर्वाद और स्नेह के लिये तहे  दिल से शुक्रिया। इसे आगे भी बनाए रखिएगा।

Monday, 21 November 2011

कुछ बातें अधूरी ही रहती हैं
कुछ सपने अधूरे ही रहते हैं
क्योंकि उन्हें
कभी पूरा नहीं होना होता।

Saturday, 19 November 2011

नाराज़ न हो

नाराज़ न हो इस तरह कि
अश्क भी इन्कार कर दें आँखों से झरने को..
.नाराज़ न हो इस तरह कि 
जिस्म भी तडफड़ाए रूह से मिलने को....
नाराज़ न हो इस तरह कि 
बसंत मे पतझड़ बनकर
मैं कहीं बिखर जाऊँ सूखे पत्तों की तरह..... 
नाराज़ न हो इस तरह कि 
तेरी यादों से परे हो जाऊँ 
और तू मुझे ढूँढे किसी कस्तूरी की तरह....
नाराज़ न हो कि 
तुझमे मैं अपना अक्स देख कर 
अक्सर यह सोचता हूँ कि 
है तू बिलकुल मेरी ही तरह ....

(यशवन्त माथुर)

Friday, 18 November 2011

चल रहा है जो जैसे
वैसे चलता रहेगा
अपनी गति से
न मेरे चाहने से
न किसी और के चाहने से
न कहने से
न सुनने से
बस एक साज है
और उसकी
एक ही धुन है
चलते जाना है
आँख पर पट्टी बांधे !

रंग दिखाने लगी है
अब तो ये आवारा ठंड
कुछ समय तम्बू तान कर
डालेगी डेरा
होके बे खबर
कि क्या गुज़रेगी
सड़कों के किनारों पर।

धन्यवाद

आश्चर्यजनक रूप से इस ब्लॉग को आप लोग और कुछ छुपे हुए लोग पसंद कर रहे हैं। पता नहीं आपने क्या देखा मेरी इन बातों में । पहले सोचा था इसे प्राइवेट ब्लॉग ही बना दूँ फिर जाने क्या मन में आया कि इसे ओपन ही रहने दिया। मुझे लग रहा था कि जहां  150 से ज़्यादा फॉलोअर्स वाला ब्लॉग है वहाँ इन छोटी मोटी बेकार बातों को मेरे अलावा और कौन पसंद करेगा। भई मैं तो पसंद करूंगा ही अपनी बातों को क्योंकि मुझे तो पसंद हैं अपनी बातें।

खैर जो भी हो अब ब्लॉग है तो बेचारा चलेगा ही और नहीं चलेगा तो मैं तो इसे चलाऊँगा ही बनाया जो है।

वैसे सच कहूँ मुझे अच्छा लगता है जब कोई मेरी बातों को अपना समझ कर पसंद करता है। हाँ एक इंसान है (नाम नहीं पूछना) जिसे यह बातें अपनी सी लगती हैं। चलो कोई तो है। 

और हाँ धन्यवाद कह रहा हूँ आप सब को इस ब्लॉग को पसंद करने के लिये  :)

Thursday, 17 November 2011

रचना ,कल्पना और वास्तविकता

रचनाकार जो लिखता है वास्तविकता से प्रेरित हो कर लिखता है लेकिन कहीं न कहीं कल्पना का सहारा भी लेता है।हालांकि कल्पना अधिकांशतः कविताओं मे ज़्यादा प्रतिशत के रूप मे पाई जाती है फिर भी कल्पना का एक हिस्सा कहानी और आलेखों मे भी नज़र आ जाता है।

अच्छा लगता है जब किसी रचना को पढ़कर कोई पाठक एक अपनापन सा महसूस करने लगता है और वो मेल पर आपकी तारीफ़ों के हवाई पुल  बांधने लगता है,लेकिन जैसे ही इस कल्पना से परे धरातल पर आने का अहसास होता है सारा अपनापन धरा का धरा रह जाता है और अवशेष रूप मे रह जाते हैं तो सिर्फ टूट कर बिखरे हुए कुछ जज़्बात।  वो जज़्बात जो किसी के लिए तो अनमोल होते हैं पर किसी एक के लिए खिलौने से कम नहीं होते। शायद कुछ लोगों की आदत ही ऐसी होती है।  

Wednesday, 16 November 2011

मेरा इंतज़ार


जंगली धूप और
मरघटी रातों मे
अनजान गलियों की ,
सुनसान  सड़कों पर
अकेले चलते हुए
मैंने देखा -
हर मोड़ पर कर रहे थे
मेरा इंतज़ार
वक़्त के अदृश्य
पहरेदार!

http://jomeramankahe.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html

Tuesday, 15 November 2011

बीती बातों का खंजर लिये
न जाने क्यों
बे रहम हो चला है वक़्त !

--यशवन्त
मुझे नहीं मालूम मेरा मुकाम क्या है ....
बस धूल के साथ उड़कर .....
हवा मे बिखर जाना चाहता हूँ .....
और खो जाना चाहता हूँ कहीं.....
हमेशा के लिये !

Its The Time To Move

Its the time to move;
to decide a plan for a journey of life,
no ray is going on a positive way,
nothing to say;
how can survive or;
how can be alive;
without a thought,
no,not,never,whatever will be done;
after death,
lets move! move for a new journey!!
with no willing;
without compromise,
Its the time to move;
to decide a plan for a journey of life.


(http://jomeramankahe.blogspot.com/2010/06/its-time-to-moov.html)
There is Nothing
except Everything

there is everything
except nothing

am confused!
I know
i saw
i belive
u r 'in a relationship'
with someone else

a bright future
is waiting for u

God Bless!

Monday, 14 November 2011

बाल दिवस की बकवास

आज है  14 नवंबर यानि बाल दिवस।  बहुत हल्ला है ...बाल दिवस का ...स्कूलों मे बच्चों से इसके लिए अलग से चंदा मांगा गया होगा और उसी चंदे से उन बच्चों को लड्डू मिठाई या आधुनिक युग की बात करें तो चॉकलेट बाँट दी गयी होगी। मुझे अच्छी तरह से याद है मेरे स्कूल मे एक केले के ठेल वाले को बुला लिया जाता था और फिर केले बांटे जाते थे। हाँ तब 2-5 रु, इसके नाम से ले भी लिए जाते थे। खैर बात आज की कर रहा हूँ तमाम तरकारी उर्फ सरकारी कार्यक्रम अब तक हो चुके होंगे,बाल कल्याण के खूब ढ़ोल पिटे होंगे अब आप कहोगे ये सरकारी को तरकारी लिखने का मतलब क्या है....मतलब साफ है  .....तरकारी को जैसे काटा छीला जाता है और खराब निकलने पर फेंक दिया जाता है ऐसे ही सरकारी कार्यक्रम भी हैं बस बातों को काटते हैं,छीलते हैं और  फेंक देते हैं ...हवा मे उड़ा देते हैं।

आज भी एक तरफ ए सी बसों मे बच्चों  को सजधज कर स्कूल जाते देखा और घर के सामने बन रहे मकान मे दो तीन मजदूरों के बच्चों को रेत मे खेलते भी देखा और हाँ जब अपनी साइकिल ठीक कराने गया तो एक बच्चे को पंचर बनाते भी देखा।

कुछ प्रश्न मन में लहर की तरह हिलोरें ले रहे हैं-

क्या बाल दिवस सिर्फ अमीरों के ही बच्चों का होता है?
क्या किसी गरीब का बच्चा एक दिन घर का चूल्हा जलने की फिक्र न करके मौज मस्ती की दुनिया मे खो सकता है?

मैं जानता हूँ इस सवाल के बहुत से आदर्श जवाब होंगे जो टिप्पणी मे मुझे संभवतः मिल भी जाएंगे लेकिन क्या मैं और आप सच मे अपने अन्तर्मन मे झांक सकते हैं?
अब सामने आना बंद कर दिया उसने कि कहीं....
नज़र मेरी उसे लग न जाए
और फिर वो सोचे
क़ुसूर किसका है ....
उसका या मेरा ?

Sunday, 13 November 2011

बेचैन शामों मे
डूबते सूरज की मंद रोशनी मे
डर  जाता हूँ अक्सर
अपना अक्स देख कर!

किसी नासमझ के लिये ....

पता नहीं...
तुम्हारा साथ कितना है....
शायद एक दिन...
तुम भी 
किसी और का हाथ थाम कर 
चले जाओगे ....
और मैं .....
खामोशी से.....
गिरते आंसुओं को पीता रहूँगा...
तुम्हारी सलामती की दुआ के साथ!

Saturday, 12 November 2011

न जाने क्यों
ये वक़्त इतनी तेज़ चल रहा है
आखिर क्यों
इस वक़्त के पास
थोड़ा भी रुकने की फुर्सत नहीं....

बहुत अजीब होता है यह वक़्त भी!
सबके जीवन मे एक मोड ऐसा भी आता है जब एक साथ की ज़रूरत होती है ,जब महसूस होता है कि कोई पास बैठे और हमे सुने ,और अगर किस्मत अच्छी रही तो सुनने वाले बहुत मिल जाते हैं ,लेकिन ऐसी अच्छी किस्मत भी कहाँ जब सुनने और समझने वाला एक भी इंसान मिल जाए;हज़ार या लाख मे एक को ही ऐसी किस्मत नसीब होती होगी। 

Friday, 11 November 2011

 इसे कभी फेसबुकपर नोट्स मे लिखा था। 

ले चुका मैं
अंतिम सांस
तड़प तड़प कर
तेरा नाम ले ले कर
इक उम्मीद थी
तुम्हारे आने की
पर मैं कब तक खुद को
संभाल कर रखता
अब तुम आओ
या ना आओ
कोई फर्क नहीं
क्योंकि  मैं
अब एक लाश के सिवा
और कुछ भी नहीं।

गुज़रा कल

कभी आज हुआ करता था
और अब बीता कल बन के
न जाने कब का गुज़र चुका हूँ
फिर भी न जाने क्या
मिल जाता है लोगों को
कि बीते फसानों में दिल जलाने को
अब भी मेरी बातें किया करते हैं।

Thursday, 10 November 2011

जहां कोई सुनने को तैयार न हो वहाँ भैंस के आगे बीन बजाने का कोई फायदा नहीं है। इससे तो एकला चलो रे ज़्यादा अच्छा है कम से कम इस तरह खुद को तसल्ली तो दे ही सकते हैं  और कुछ हो या न हो।

Wednesday, 9 November 2011

Who says Love is beautiful?
am completely disagree; coz Love always hurts.
if u fall in love, u should always be ready to bear the pain in your heart,soul and mind.


कुछ लोगों के लिए जज़्बातों की कोई कीमत नहीं होती ऐसे लोग दूसरे के जज़्बातों से खेलकर मज़े लेते हैं लेकिन ये नहीं जानते कि कभी उनके साथ भी ऐसा ही हो सकता है। वक़्त आज उनके साथ है ,रहने दीजिये,खुद को तसल्ली देना और खुद का साथ देने मे ही समझदारी है क्योंकि खुद से अच्छा खुद का कोई दोस्त नहीं होता।

यह मन भी ना

ये मन बहुत अजीब होता है जब सोचता है तो किसी एक को इतना सोचता है कि बस और जब वो नज़रों से उतर जाए चाहे किसी भी वजह से तो उसके हर एहसास से नफरत सी होने लगती है ;फिर भी वह एहसास रह रह कर काटने को दौड़ते हैं और यह मन हमे छोड़ देता है बेहिसाब तड़पते रहने के लिए।

Tuesday, 8 November 2011

पता नहीं क्यों लोग गधे को गधा कहते हैं जबकि गधा सहनशीलता को समर्पित एक सामाजिक प्राणी है। ये बात और है कि कभी कभी वो दुलत्ती मार कर अपनी संवेदनशीलता का एहसास भी करा देता है।

Monday, 7 November 2011

पुनर्जीवन

एक ख्वाब कल रात को देखा .....अनजाने भंवर मे ......मैं घिरता जा रहा था .....फँसता जा रहा था .....निहायत ही अकेला .....और निर्वात का ......एक अजीब सा अनुभव.......जहां मेरी चीख़ों और दर्द को ........कोई सुनने वाला ही नहीं था.......कि  तभी महसूस हुआ पीठ पर एक हाथ .....कौन था वो नहीं पता पर खीच लाया.....उस भयंकर निर्वात से मुझको .....और मैं जी रहा हूँ पुनर्जीवन .....उसी की बदौलत। 

शशि शेखर


बहुत बचपन मे (7-8 साल की उम्र मे ) हमारे घर 'आज' अखबार आया करता था। संपादकीय पढ़कर पापा अक्सर कहते आज शशि शेखर ने ये लिखा वो लिखा (तब वह आगरा संस्करण के स्थानीय संपादक थे 90 के दशक मे) ;मेरी समझ मे तब ये बातें नहीं आती थीं बस इतना समझ गया था कि शशि शेखर अखबार मे लिखते हैं। पर आज जब वह 'हिंदुस्तान' के प्रधान संपादक हैं हर रविवार उनके आलेख को मैं  ज़रूर पढ़ता हूँ। हो सकता है कुछ लोगों का उनकी बात से मत वैभिन्नय हो पर उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी बात यह है कि सड़क पर रिक्शा चलाने वाला और झूग्गी मे रहने वाला थोड़ा भी पढ़ा लिखा आदमी उनकी बात आसानी से समझ सकता है।
एक अच्छी लेखन की शैली की यही तो विशेषता है कि वो आम पाठक को बांधे रखे और बात उसको समझ मे आने वाली हो। इस दृष्टि से शशि शेखर मेरे सबसे पसंदीदा स्तंभकार हैं।

Sunday, 6 November 2011

चाहत सिर्फ चाहत होती है। ज़रूरी नहीं कि आप जिसे चाहें वो आपको भी चाहे,उतना ही चाहे जितना आप चाहते हैं। चाहत अनमोल है पर कुछ लोग बेदर्दी से इस चाहत का कत्ल कर देते हैं। 

Saturday, 5 November 2011

जीवन का एक सच........

किसी बहुत ही अज़ीज़ ने कभी यह एस एम एस भेजा था--

"जीवन का एक सच -
सच्चा प्यार हमेशा गलत इंसान से होता है 
और जब सही इंसान से होता है तब गलत वक़्त पर  होता है। "

पता नहीं आपकी नज़रों मे यह सच है या नहीं पर मुझे सच लगता है।

Friday, 4 November 2011

वो

किसी ने दरवाजा
ज़ोर से खटकाया
मैंने खोला
और उसे देखा
तो देखता ही रह गया
वो मुस्कुरा रही थी
किसी बिछड़े दोस्त की तरह
इस शहर मे
मेरे होने की खबर पाते ही
वो दौड़ती हुई आई थी
वो
वो
अरे हाँ वो
वो
जो मेरी मौत थी।

बातें खुद से .......

कुछ अधूरे से शब्द
कुछ अधूरी सी बातें
जो अक्सर अधूरी 
ही रह जाती हैं
बस कुछ शब्द-
कहूँगा यहाँ
और करूंगा
कुछ बातें खुद से!