इस ब्लॉग पर पोस्ट की गयी तस्वीरों (Photographs) पर क्लिक कर के आप उन्हें और स्पष्ट देख सकते हैं।

Wednesday, 30 October 2013

हमें अपना उत्साह पहले की ही तरह कायम रखना होगा ।

फेसबुक पर मौजूद तमाम स्टेटस से ज्ञात होता है कि दीपावली की साफ सफाई में काफी लोग जुटे हुए हैं खास तौर से महिलाएं। एक तो घर के ढेर सारे काम उस पर से ये त्योहार....उफ़्फ़ ! लेकिन यह उफ़्फ़ सिर्फ हम ही लोग कर सकते हैं क्योंकि अपना तो काम ही की बोर्ड के खटराग बजाना है। महिलाओं के शब्द कोश मे उफ़्फ़ नाम का या तो कोई शब्द नहीं होता और अगर गलती से होता भी है तो उसका कोई अर्थ नहीं होता।

अगर अपने घर की बात करूँ तो भई हम 3 ही लोग के घर मे कोई खास ज़्यादा मशक्कत वाला काम नहीं है कि कई दिन पहले से जुटना पड़े। बाकी थोड़ी बहुत झाड पोंछ तो होती ही है।

कुछ साल पहले तक दशहरा बीतने के साथ ही दीवाली का बाज़ार सज जाया करता था। उत्साही बच्चे बम -पटाखे फोड़ना शुरू कर देते थे और पूरे अड़ोस-पड़ोस मे एक अलग तरह की हलचल रहती थी। अब तो हर त्योहार की तरह दीवाली भी अपना रंग और तस्वीर बदल रही है। आज अभी तक खील बताशे की इक्का दुकानें ही सजी हैं। संभवतः धनतेरस से बाज़ार अपने रंग मे आएगा हालांकि महंगाई की मार का बुरा असर रौनक पर भी पड़ा है। लगता है जैसे सब कुछ एक औपचारिकता बन कर रह गया है। इस सबके बावजूद सोशल मीडिया और प्रेस के असर से लोग जागरूक भी हो रहे हैं।  पटाखों की घटती बिक्री निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भविष्य का एक बेहतर व सकारात्मक संकेत है।

फिर भी एक बात अक्सर सोचता हूँ कि त्योहारों का जो उत्साह हमारे बीते कल में  था वाह आज नहीं है और जो आज है शायद आने वाले कल मे वाह भी इतिहास हो जाय। अगर नहीं तो हमें अपना उत्साह पहले की ही तरह कायम रखना होगा ।

Saturday, 26 October 2013

आजकल यानी के पीछे पड़ा हूँ

जिन्हें नहीं पता वो सोचेंगे आखिर मैं कौन यानी के पीछे पड़ा हूँ तो मैं बता दूँ की यानी (Yanni) एक पश्चिम के बहुत बड़े संगीतकार हैं।

पिछली पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए यह भी कहूँगा कि जब मैं कोई गाना (हिन्दी या अङ्ग्रेज़ी) या इन्स्टृमेंटल म्यूज़िक सुनता हूँ और अगर वह मुझे बहुत पसंद आ जाता है तो बस उसे ही सुनता रहता हूँ जब तक मन न भर जाए। कई बार तो ऐसा होता है एक ही गाना पूरे दिन सुनता रहता हूँ।  फिलहाल काफी दिन से ऐसा कुछ यानी के साथ हो रहा है। बहुत बुरी तरह से पीछे पड़ गया हूँ उनके। यानी को मैं तब से जानता हूँ जब 1997 में उनका अब तक का एकलौता कॉन्सर्ट आगरा मे हुआ था। हालांकि ताजमहल के पीछे होने वाले उस कार्यक्रम मे मैं प्रत्यक्ष उपस्थित नहीं था लेकिन16 साल बाद यानी इसी साल 2013 में मुझे वह कॉन्सर्ट यूट्यूब पर देखने को मिल गया। और उसके बाद समझिए यानी जी की शामत ही आ गयी क्योंकि ethnicity,keys to imagination,if i could tell you, और out of silence जैसे एल्बम्स को मैंने डाऊनलोड कर लिया है। जब तब सुनता ही रहता हूँ और इस पोस्ट को लिखते हुए भी सुन रहा हूँ।

एक बात और मुझे लाइव कॉन्सर्ट देखने का भी बहुत शौक है। bee gees  के भी कई लाइव कॉन्सर्ट मैंने डाउन्लोड किए हुए हैं :) और उसका कारण है ऑर्केस्ट्रा।  ऑर्केस्ट्रा मे बजते तरह तरह म्यूजिकल इन्स्ट्रुमेंट जी तरह से परफ़ोर्म करते हैं,उनको बजाने वालों के जो हाव भाव होते हैं वह हमेशा से मुझे आकर्षित करते हैं। कभी मेरी भी तमन्ना थी कि पियानो या गिटार बजाना सीखूँ लेकिन अब औरों को बजाते देख कर सुकून महसूस करता हूँ।

फिलहाल मुझे बस इतना कहना है  कि आप भी बच के रहिएगा जैसे आज यानी के पीछे पड़ा हूँ ,हो सकता है कल आपकी ही किसी ब्लॉग पोस्ट के पीछे पड़ जाऊँ :D

आखिर कुछ भी हो सकता है न :)।

गुड बाय!

Monday, 21 October 2013

म्यूज़िक मेरा नशा

मेरे लगभग सभी दोस्त जानते हैं कि मैं म्यूज़िक का बहुत बड़ा शौकीन हूँ। आप कुछ भी कहें लेकिन मुझे लगता है मेरी पसंद कुछ अजीब तरह की है। अगर मुझे इंडियन म्यूज़िक सुनना होता है तो मैं बहुत पुराने गाने सुनना पसंद करता हूँ। के एल सहगल जी ,मुकेश जी ,रफी साहब ,किशोर दा,हेमंत दा आशा जी और लता जी के गानों की बात ही और है। खास तौर से आशा जी और किशोर दा के गाने .....जब सुनने लगता हूँ तो समय कब बीतता है पता नहीं चलता।

लेकिन 1990 के बाद की भारतीय फिल्मों के गाने मुझे इक्का दुक्का ही पसंद हैं। एक तो आज कल के गाने कभी कभी लगता है कि कॉपी पेस्ट हैं। सिन्थेसाइजर की वजह से सभी की धुन एक जैसी ही लगती है बस बीट्स और इन्स्ट्रूमेंट्स बदले से लगते हैं। इससे बेहतर तो एनरिक इग्लेसियस को सुनना लगता है। वैसे सच कहूँ तो ओल्ड इज़ गोल्ड का मुहावरा किसी ने  यूं ही नही गड़ा होगा। अङ्ग्रेज़ी गानों मे भी जो मज़ा BEE GESS और KENNY ROGERS को सुनने मे है वह मज़ा एनरिक या माईली सारस को सुनने में नहीं आता। लेकिन उस सबके बावजूद विदेशी संगीत मे मौलिकता ही झलकती है। पता नहीं क्यों हमारे बॉलीवुड के नकलची संगीतकार लोग तकनीक के साथ तकनीक को मौलिकता के साथ प्रयोग करना नहीं सीखते या सीखना नहीं चाहते।   

Tuesday, 15 October 2013

सपने...स्कूल के दिन और यादें

कुछ यादें ऐसी होती हैं जो हमारे स्मृति पटल पर कहीं हमेशा के लिए अंकित हो जाती हैं और रह रह कर हमें अपने आवरण से ढक लेती हैं।  इस आवरण के भीतर कभी कभी कभी हम ऐसे खोते हैं कि उससे बाहर आने का मन ही नहीं करता। मेरे स्कूली दिनों की यादें भी ऐसी ही हैं। लगता है जैसे कल ही स्कूल छोड़ा हो। वैसे भी जीवन मे कुल 3 ही स्कूल देखे मैंने। और लोगों की तरह पापा ने हर साल-दो साल पर मेरा स्कूल नहीं बदला। श्री एम एम  शैरी स्कूल कमला नगर आगरा,श्री राधा बल्लभ इंटर कॉलेज दयाल बाग आगरा,और राजा बलवंत सिंह महा विद्यालय बस यही 3 स्कू, रहे मेरे। इसमे भी सबसे ज़्यादा समय एम एम शैरी स्कूल मे बीता। नर्सरी से कक्षा 10 तक की पढ़ाई वहीं की। तो याद वहीं की सबसे ज़्यादा आती है। और आज कल तो हद हो गयी है, रोज़ सपने में किसी क्लास मे खुद को पाता हूँ। नींद के आगोश मे खोना यानि स्कूल के दिन का शुरू होना। आँख बंद करते ही अपने स्कूल के मैदान मे प्रार्थना करना...हम को मन की शक्ति देना ,फिर जन गण मन,उसके बाद पीटी और फिर क्लास मे जाना। क्लास मे अपनी बेंच पर बैठना, साथियों से लड़ना,मैडम की डांट  खाना ,क्लास रूम रीडिंग मे हिन्दी और संस्कृत के पाठ को तेज़ी से शुद्धता के साथ पढ़ना और तारीफ पाना,अङ्ग्रेज़ी और गणित की क्लास मे घबराया हुआ रहना (क्या दिन थे वो भी) ,इंटरवल और फिर जब स्कूल की छुट्टी कि घंटी बजती है तो क्लास से बाहर भागते ही नींद टूट जाती है,सपनों के बाहर दिन निकल चुका होता है और सुबह के 6-7 बज रहे होते हैं। सपने के इस स्कूल की  खास बात यह है कि होम वर्क नहीं मिलता। ऐसे सपने देख कर बिस्तर से उठने का मन नहीं करता। जी करता है स्कूल की वह ड्रेस फिर से पहन लूँ और पहुँच जाऊँ अपने बचपन की किसी क्लास में। शायद इसीलिए हर सुबह घर के सामने से गुजरते स्कूली बच्चों को देख कर मेरा मन भी उन्हीं का हाथ थाम कर पूछने को होता है मुझ से दोस्ती करोगे ?