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Saturday, 6 September 2014

फेसबुक 05 सितंबर 2014

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1520511554856554&set=a.1377840199123691.1073741828.100006931712592&type=1&theater


अक्सर सोचता हूँ कि पापा के अलावा ,स्कूल के दिनों मे अगर जौहरी मैडम मुझे अपने लिखे को किसी डायरी या कॉपी मे सहेज कर रखने को नहीं कहतीं,अगर रंजन सर बी कॉम मे एकाउंट्स,इन्कम टैक्स और कंपनी लॉ की किताबें और अपना मार्गदर्शन न देते,नौकरी मे आने के बाद अगर ऑन जॉब ट्रेनिंग के दौरान Shubbrato सर प्रेरित नहीं करते या मैं उनकी टीम मे नहीं होता....तो मैं आज क्या होता और कैसा होता ? क्या मैं वही होता जैसा आज हूँ ? शायद नहीं । और इसी वजह से मैं सिर्फ शिक्षक दिवस या गुरु पुर्णिमा पर ही नहीं बल्कि हर दिन अपने इन तीन शिक्षकों को याद करता हूँ।
वक़्त बहुत तेज़ी से चलता है। बी कॉम किए हुए 9 साल हो गए,नौकरी छोड़े हुए 4 साल से ज़्यादा हो गए लेकिन जो आधार एक बार बन जाता है वही हमेशा हौसला और सहारा देता है।
आज शिक्षक दिवस पर मैं अपने इन सभी शिक्षकों को कृतज्ञतापूर्वक धन्यवाद देता हूँ।

Monday, 1 September 2014

घटिया कवि की खोज में .....सुधीश पचौरी जी का व्यंग्य -साभार-'हिंदुस्तान'-31 अगस्त 2014

सुधीश पचौरी जी का यह ज़बरदस्त व्यंग्य अपने तीखेपन के साथ साहित्य और ब्लॉग जगत मे फैली चाटुकारिता पर प्रहार करता है। 
आप भी पढ़िये-



घटिया हूं। और लोग बढ़िया की खोज में लगे रहते हैं, मैं घटिया की खोज में लगा रहता हूं। घटिया होना बढ़िया होने से बढ़िया है। हर आदमी घटिया नहीं हो सकता। मुझसे अधिक घटिया हो ही नहीं सकता। मैं साहित्य तक में घटिया खोज चुका हूं। मेरे संज्ञान में अब तक हिंदी के किसी आलोचक ने साहित्य में घटिया की तलाश नहीं की है। साहित्य में घटिया होना और भी दुर्लभ है। इस दुर्लभ को खोजना किसी आविष्कार से कम नहीं। साहित्य में घटिया की शुरुआत मुझ घटिया से हो रही है। हिंदी आलोचक हर कविता की ‘बढ़िया-बढ़िया’ करते रहते हैं। इसके बरक्स मैं हर कविता-कहानी की ‘घटिया-घटिया’ करना चाहता हूं। वे बढ़िया के अभ्यासी हैं, मैं घटिया का व्याख्याता हूं। जब-जब ‘बढ़िया-बढ़िया’ का सीजन आता है, मैं उसकी ‘घटिया-घटिया’ करने लगता हूं।

हिंदी में दो ही विशेषण है। एक बढ़िया, दूसरा घटिया। बाकी सब विशेषण इन दो के आगे-पीछे लगे रहते हैं। ‘बढ़िया-बढ़िया’ करने वालों की भाषा इतनी ‘बढ़िया’ हो जाती है कि किसी की समझ में नहीं आती। लेकिन घटिया कहते ही न केवल बात तुरंत समझ में आ जाती है, बल्कि बोर से बोर पाठक तक खुश होता है कि चलो, कोई तो माई का लाल है, जो बढ़िया-बढ़िया करने वालों की घटिया-घटिया करता है।

घटिया एक ऐसा घटिया विशेषण है, जिसका इतिहास न लिखा गया है, न मेरे सिवा कोई लिख सकता है। इसका इतिहास लिखने के लिए सबसे घटिया में भी घटिया यानी ‘घटियोत्तम’ होना पड़ेगा। भगवान भी ऐसे होनहार अवसर पर बड़े घटिया किस्म के दुर्योग जुटा देता है कि कुछ कहते नहीं बनता! ‘अविगत गति कछु कहत न आवै!’
हे पाठक श्रेष्ठ! साहित्य के जिस नंदन-कानन में हिंदी के ‘बढ़िया-बढ़िया’ कवि नित्यप्रति विहार किया करते हैं, जहां की सुंदर उपत्यका से सटे क्रीड़ा पर्वत पर शुकादि कलरव करते रहते हैं, उसी साहित्यिक आखेट-स्थली में मेरा खोजा एक घटिया कवि मुझे अचानक मिल गया।
मैंने उससे सादर कहा: कहिए घटिया जी?
कवि को 444 वोल्ट का झटका लगा। उसके आगे न मुझे कहना हुआ, और न उसे सुनना हुआ। प्रथम क्षण में ही क्लाइमेक्स था: ‘प्रमाता के हृदय का प्रसुप्त स्थायी भाव देशकाल परिस्थिति में मेरे ‘घटियोवाच’ के संयोग से अचानक रौद्र रस जागृत हो गया। रुद्र मुद्रा देख मेरा घटिया मन क्षणमात्र को प्रकंपित हुआ। किंतु आनंद-कानन के उस सुरम्य वातावरण ने मेरी सहायता की। इस कानन में बौद्धिक फाइट को छोड़ शेष ‘फाइट’ वर्जित हैं। उसके बाद वह पलायन करता हुआ दिखा। कुछ दूर से ही एक बार फिर मैंने कहा- मेरी नजर में आप एक घटिया कवि हैं, इसीलिए कहा घटिया।

उसके बाद मैंने साहित्य में ‘सॉरी’ कहा और कार में बैठ गया। ‘बढ़िया-बढ़िया’ करने वाले अक्सर कहते हैं कि फलां कवि ने बड़ा संघर्ष किया है, इसीलिए वह बढ़िया कवि है। लेकिन मैं इस ‘संघर्ष’ की असलियत जानता हूं। असली संघर्ष तो तब शुरू होता है, जब आप किसी के ‘बढ़िया-बढ़िया’ की गलतफहमी दूर करके उसे सादर घटिया कहना शुरू करते हैं। आप इस कवि का नाम जानने को आतुर होंगे, तो मैं वादा करता हूं कि किसी एक दिन बताऊंगा जरूर। ‘बढ़िया-बढ़िया’ तब तक बढ़िया नहीं हो सकता, जब तक ‘घटिया-घटिया’ न हो। बढ़िया के लिए एक घटिया जरूरी है, लेकिन घटिया कहने के लिए बढ़िया कतई जरूरी नहीं है। मैं हिंदी साहित्य का एक घटिया इतिहास लिखने वाला हूं, प्रतीक्षा करें।

http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/guestcolumn/article1-Poor-people-perfect-search-50-62-448278.html

Wednesday, 27 August 2014

फेसबुक 26 अगस्त 2014 ( Important for LADIES )

https://www.facebook.com/IdeaDigeZt/photos/a.1431103550501043.1073741828.1428678334076898/1438647823079949/?type=1&theater

Very important msg for grls in dressing room do it first. Boys please tell to your sister's & lover & ur girl frnds.:
www.ideadigeZt.com

Just conduct this simple test: Place the tip of your fingernail against the reflective surface and if there is a GAP between your fingernail and the image of the nail, then it is GENUINE mirror. However, if your fingernail DIRECTLY TOUCHES the image of your nail, then BEWARE! IT IS A 2-WAY MIRROR!

"No Space, Leave the Place." So remember, every time you see a mirror, do the "fingernail test." It doesn't cost you anything.

REMEMBER. No Space, Leave the Place

फेसबुक 25 अगस्त 2014

फोटो पर क्लिक कर के स्पष्ट देख सकते हैं

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=574788829296714&set=a.434741623301436.1073741837.100002968064606&type=1&theater

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समय की सीढ़ियों से चढ़कर-उतर कर दो कदम 
हमकदम बन कर राहों पे निशां छोड़ चलेंगे ......

जब आएंगे तीखे मोड़, तब थाम कर के हाथ
हम यूं ही अपनी मंज़िल की ओर चलेंगे.............। 
--यशवन्त यश ©
(इस चित्र को देख कर जैसा मेरे मन ने कहा)

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फेसबुक 24 अगस्त 2014

फोटो पर क्लिक कर के स्पष्ट देख सकते हैं

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1512149909026052&set=a.1377840199123691.1073741828.100006931712592&type=1&theater
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इस दुनिया मे यूं तो कोई किसी को याद नहीं रखता लेकिन कहीं कोई ऐसा भी होता है जो समय के लंबे पलों के बाद भी आपको उसी तरह याद रखता है जैसे आप उसके अपने हों।Ashish Rastogi जी ऐसे ही गिनती के लोगों मे से हैं ।
इनसे मेरी सबसे पहली मुलाक़ात मेरठ मे तब हुई थी जब मैं बिग बाज़ार के कस्टमर सर्विस पर था और वह आंटी जी के साथ कुछ सामान एक्सचेंज करने के लिए आए थे। पता नहीं मेरे काम मे ऐसा क्या दिखा कि वहाँ कि कस्टमर फीडबैक बुक पर यह शब्द लिखे--"Thanks Yashwant for his eagerness to help. God bless." (मुझे यह शब्द हू ब हू याद हैं क्योंकि मेरे कैरियर का यह सबसे पहला रिमार्क था जो एक कस्टमर के तौर पर उन्होने मेरे लिये लिखा था  )
स्टोर के ओफर्स मे रुचि देख कर मैंने खास खास ओफर्स के बारे मे आशीष जी को फोन पर भी बताना शुरू कर दिया और बाद मे मेरा ट्रांसफर कानपुर हो जाने से मेरा संपर्क कट गया 
2010 मे नौकरी छोड़ देने के बाद मैंने ब्लोगिंग मे भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया और फिर एक दिन ब्लॉग पर आशीष जी का वह कमेन्ट आया जो आप इस फोटो मे देख सकते हैं।
यह कमेन्ट मेरे ब्लॉग का सब से कीमती कमेन्ट है जो हमेशा मुझे याद दिलाता है कि सालों पहले मॉल मे काम करने वाले मुझ जैसे एक अदने से इंसान को भी कोई याद रख सकता है।
मेरी कामना है आशीष जी का आशीष मेरे साथ, और ऊपर वाले का आशीष, आशीष जी के साथ हमेशा बना रहे।
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Thursday, 2 January 2014

नया साल मुबारक

नया साल आ गया।आने की साथ ही दोस्तों की शुभ कामनाओं का अंबार फेसबुक और मेल पर लग गया।
मैंने भी सबको शुभ कामनाएँ दीं।

ऐसे मे फेसबुक पर मेरे बधाई संदेश के बाद एक दो मित्रों का जवाब आया कि वह क्षमा चाहते हैं, वह हिन्दुस्तानी हैं और उनका नया साल  चैत्र के महीने से शुरू होता है। लिहाजा अंग्रेजों के नए वर्ष को मानने और मनाने का प्रश्न नहीं उठता।
चलिये ठीक है उनकी अपनी सोच है और हम किसी की सोच को बदलने का कोई हक नहीं रखते; पर उनके इस जवाब ने कुछ प्रश्न मेरे दिमाग मे खड़े किये--

  • हिन्दुस्तानी होने का इतना ही ख्याल है तो उनके ब्लॉग हिन्दी के अलावा अङ्ग्रेज़ी मे भी क्यों हैं ?
  • क्यों आप अङ्ग्रेज़ी तारीख के हिसाब से अपना जन्मदिन मनाते हैं ?
  • जिस फेसबुक और गूगल के प्लेटफॉर्म का प्रयोग अपने मित्रों के संपर्क मे रहने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए करते हैं उनके मुख्य कर्ता धर्ता अंग्रेज़ ही हैं । 
  • जिस कंप्यूटर पर बैठ कर हम और आप लिख रहे हैं उसे भी मूल रूप मे अंग्रेजों ने ही आविष्कृत किया भले ही इन आविष्कारों के सिद्धान्त प्राचीन भारतीय ग्रन्थों से लिए गए हों। 
  • जो वेषभूषा हम और आप आजकल धरण करते हैं वह भी अंग्रेजों की ही देन है। 

इस तरह कई प्रश्न और भी दिमागमें घुमड़ने लगे लेकिन मैं फालतू की बहस न करता हूँ न इसमे पड़ना चाहता हूँ। भारतीय संस्कृति सर्वधर्म समभाव की रही है, यहाँ अनेकों आक्रांताएँ आईं और गईं ।
धारयाति इति धर्म: की बात भी यहीं कही गयी है। अतःभले ही 1 जनवरी से शुरू होने वाला साल विदेशियों की देन हो हमें उसे ठीक वैसे ही उत्साह के साथ मनाना चाहिए जिस उत्साह से हम होली,दीवाली,ईद और क्रिसमस आदि मनाया करते हैं।

सभी को नव वर्ष 2014 सपरिवार शुभ और मंगलमय हो।